Saturday, July 22, 2017

बदला या बदलाव

                                        pic by Saurabh Kulkarni

मनुष्य में "अपेक्षा" की प्रकृति  जन्मजात होती है । रोने के बदले दुलार, मुस्कुराने के बदले मुस्कराहट ..एक छोटे बच्चे को भी पता होता है कि किसके बदले क्या मिल सकता है । यह अपेक्षाए कब हमारे स्वाभाव का हिस्सा बन जाती हैं पता नहीं चलता, जब तक.....बदले में जो मिलता है उसकी अपेक्षा न हो।

चॉकलेट मांगता छोटा बच्चा तब चकित रह जाता है जब उसे कभी दुलार से चॉकलेट दिलाने वाले उसके माता-पिता,  चॉकलेट के बदले सड़ते दाँतों का हवाला दे कर उसकी मांग पूरी करने से मना  कर देते हैं । इस बदले का बदला वो गाला फाड़कर रो कर, जमीन पर लोट कर या बाहरी लोगों के बीच माँ - बाप का अपमान करके देता है, फिर इस जिद का बदला उसके गालों पर या पीठ पर नज़र आता है।

भौतिकी में पढ़ा न्यूटन का तीसरा नियम सभी बच्चों को सबसे पहले समझ आ जाता है (ये बात और है कि परीक्षा में भी पहला या दूसरा  नियम पूछने पर वो तीसरे नियम की व्याख्या कर देते हैं ) । इस नियम के अनुसार " हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है", जीवन दर्शन का एक उत्कृष्ट नियम है यह ।
हर परिस्तिथी में सही बैठता है।

अब बात करते हैं "बदलाव" की... बदले की तरह ये हमारे अंदर ही होता  पर चूँकि शिशु अवस्था में  ये प्रकृति       द्वारा चलित होता है (उदाहरण के लिए शारीरिक विकास भी एक बदलाव ही है पर प्रकृति शाषित) बड़े होने पर हम इसका महत्व भूल जाते हैं  । सही समय पर सही बदलाव हमारे जीवन की दिशा बदल सकता है । किसी घटना (बुरी घटना) पर हम बदला या बदलाव के बीच अक्सर बदले को चुनते हैं और फिर शुरू हो जाती है बदले की क्रिया -प्रतिक्रिया (चेन रिएक्शन )। यहीं एक बार ही सही, अगर  हम बदलाव को चुनकर देखे तो हमारा दृष्टिकोण निर्णयात्मक न हो कर सकारात्मक बदलाव का रहता है। तब हम समस्या के आकर  की तरफ न देख कर समस्या के समाधान का विचार करते हैं । इस बदलाव की प्रक्रिया का एक और फायदा होता है की कौन सा बदलाव लाना है ये सोचने में हम अपनी पहली प्रतिक्रिया (जो की अधिकांशतः विरोद्ध या नकारात्मक प्रदर्शन होता है) नहीं देते । ये कुछ पल का  अंतर्मुखी होना न सिर्फ हमें दूसरे की क्रिया और खुद के क्रोध से  बचा लेता है अपितु सामने  वाले को भी बदले की अपेक्षा बदलाव दिखा कर अचंभित और परेशान कर देता है । इस तरह क्रिया की प्रतिक्रिया न होकर  दोनों पक्षों में एक सकारात्मक बदलाव दिखाई देता है ।

बदलाव को अपनाना आसान नहीं परन्तु इतना कठिन भी नहीं है । आखिर इसके "बदले" मिलने वाली ख़ुशी और सुकून का मोल दिलों में आने वाली दुरी से तो कही ज्यादा है। किसी भी परिस्थिति में बदला या बदलाव का चुनाव परिणाम को बदल सकता है । अब ये हम पर है की "बदले" के साथ मानसिक परेशानी और जलन को चुने या फिर खुद में "बदलाव" ला कर प्रसन्नता और शांति को ......फैसला हमारा है  ।

Wednesday, July 12, 2017

जीवन चक्र


जीवन कि शुरुआत बच्चे के जन्म के साथ होती है, माँ ही उसकी दुनियाँ होती  है और माँ के लिए वो ही दुनियाँ। थोड़ा बड़ा होने पर लाड दुलार के साथ वो खुद कि दुनियाँ में अपने परिवार जनो को जोड़ता है, अभी भी माता पिता  की अहम् भूमिका होती है और समय के साथ-साथ भाई-बहनों की भी अहमियत बढ़ती जाती है।

किशोरवय आते आते उसकी प्राथमिकताएं बदलती हैं, मित्र थोड़े करीब और माता-पिता थोड़े दूर हो जाते हैं। इसी समय माता-पिता की नज़र में भी उसकी अच्छाइयों के साथ साथ बुराइयां दिखाई देने लगती हैं। यह मन की दूरी बढ़ते जीवन के साथ बढ़ती जाती हैं । जो  कभी जान से भी प्यारा था, अब निराशाजनक और बुरा लगने लगता है। व्यस्क होते बेटे और पिता के संवाद अब झगडे का  रूप ले लेते हैं। "मुझे पैदा क्यों किया" से ले कर तुम आये ही क्यों दुनियाँ में" तक, विचारों की भिन्नता कब अहम् की चादर ओढ़ लेती है पता ही नहीं चलता।

जवानी का  जोश जहाँ किसी की परवाह नहीं करता वही, किसी और की जरुरत भी महसूस नहीं होने देता।
 आत्मविश्वास से पाइ गयी , नौकरी में प्रगति और  दोस्तों का साथ,  जैसे हर रास्ते को मुमकिन बनाने की ताकत दे देता  है।

शादी के साथ ही उसके संसार में एक नए सदस्य के पदार्पण होता है। एक दूसरे को समझने के प्रयास में आकर्षण और प्रेम पनपता है । एक समय आता है जब पति पत्नी एक दूसरे में ही अपनी दुनियाँ ढूंढ लेते हैं, पर समय का  नियम फिर काम करने लगता है।  बदलता वक्त सबसे प्रिय व्यक्ति को बुरा साबित करने लगता है। बच्चे के जन्म के साथ फिर  एक नया समय चक्र चालू हो जाता है।

ऐसा नहीं है की समय का रिश्तों के साथ सिर्फ यही अकेला नियम है, दूसरा नियम तो हमे सोचने पर मजबूर कर देता है। जब व्यक्ति बूढ़ा हो जाता है और कुछ करने लायक नहीं रहता, तब यही नियम उल्टा हो जाता है । अब दूसरों से व्यक्ति की अपेक्षाए बढ़ जाती हैं, अपने द्वारा की गई गलतियों के पश्च्याताप होने लगता है ।
माता पिता की सही कीमत पता चलती है और लगता है की सब साथ रहे, सब साथ दें।
पर समय तो समय है नीम, बबूल बोने पर आम की अपेक्षा व्यर्थ है, क्योकि तब आस पास के लोग अपने उस दौर से गुजरते रहते हैं जब उन्हें किसी की जरुरत नहीं होती ।

इस चक्र में एक बीच का रास्ता भी होता है जो "आज" से गुजरता है । अपने आज में जो आपके साथ हैं उनकी कीमत पहचानकर हम अपना "आने वाला कल" बदल सकते हैं । अपने आज के  व्यव्हार की मधुरता हमें हमारे उस जरुरत के वक्त में मिठास भरेगी । माता पिता, भाई बहन , पत्नी, संतान या मित्र सम्बन्धी , इन सबसे आज किया मधुर व्यव्हार हमारे कल को उत्साह और आनंद से भर सकता है  । समय के क्या है..."कल" तो आना है और आकर रहेगा, जीवन चक्र  तो चलता  ही रहेगा और वो भी अपने नियमों पे । अब ये हम पर है की हम किस विकल्प को चुनते हैं । 

सिर्फ तुम्हारे लिए


आज इक दुआ की है सिर्फ तुम्हारे लिए
जिंदगी को जीने की वजह दी है सिर्फ तुम्हारे लिए ..

दिल की विरानियो में, खुशियों की आहट बना
एक चिराग से रौशनी की है सिर्फ तुम्हारे लिए ...

चलकर अकेले इन राहों में, थक चुके हैं हमारे कदम
साथ चलने के इरादे से हाथ बढ़ाया है सिर्फ तुम्हारे लिए ...

ये सच है की तक़दीर लिखने वाला है कोई और
हथेली की लकीरों में लिख रहे हैं आज कुछ सिर्फ तुम्हारे लिए ...

इस बात के शायद तुम्हे इल्म भी ना हो कि
कोई चाहता है सारी दुनियां कि ख़ुशी सिर्फ तुम्हारे लिए ...