Tuesday, May 4, 2010

प्यार , शादी और मक्का :)


मैंने ये किस्सा एक Magazine में पढ़ा, मुझे ये इतना पसंद आया की लगा इसे share करूँ

"एक युवा, एक दार्शनिक के पास पंहुचा और बोला मेरी मदत करिए मैं बहुत परेशान हूँ
मुझे बताइए की प्यार क्या है ?
उस दार्शनिक ने कहा "इस प्रश्न का उत्तर मैं तुम्हे जरुर दूंगा पर तुम पहेले मेरा एक काम करो, मेरे घर के पीछे मक्के का खेत है, वहां से मेरे लिए एक मक्का लाओ जो तुम्हे लगे की सबसे अच्छा मक्का है, पर एक शर्त है की तुम सिर्फ एक बार ही एक दिशा में जा सकते हो, पलट कर पीछे नहीं जा सकते
उस युवा ने सोचा बहुत आसान काम है, उसने खेत में चलना शुरू किया, बहुत अच्छे मक्के लगे थे, उसने सोचा की शुरुआत में इतने बड़े और अच्छे मक्के हैं तो अन्दर तो और भी बड़े मक्के होंगे, और वो चलता रहा, पर उसने देखा की आगे के मक्के पहेले जितने अच्छे नहीं थे, पर चुकि शर्त के अनुसार वो वापस नहीं जा सकता था वो एक साधारण मक्के को लेकर दार्शनिक के पास पंहुचा
दार्शनिक ने पूछा - क्या ये मक्का तुम्हारे हिसाब से सबसे अच्छा मक्का है ? तो युवक ने कहाँ - नहीं, पहेले के मक्के ज्यादा अच्छे थे पर मुझे लगा आगे और अच्छे मिलेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ, और शर्त के कारण मुझे बाद के इस साधारण मक्के से संतोष करना पड़ा
दार्शनिक ने कहा - यही प्यार है, हमे लगता है कि जो हमें मिल रहा है, इससे ज्यादा अच्छा हमे आगे मिलेगा, और बाद में हमे साधारण से समझौता करना पड़ता है
फिर उस युवक ने पूछा - अगर ये प्यार है तो शादी क्या है ?
दार्शनिक ने उसे फिर से वही करने को कहा, उसी शर्त के साथ
इस बार उस युवक ने सोचा - क्या पता बाद में ज्यादा अच्छे मक्के मिलेँ, इसलिए उसने एक मक्का चुना और दार्शनिक के पास आया
दार्शनिक ने उससे फिर वही प्रश्न किया - कि क्या यहि मक्का सबसे अच्छा था ?
तब युवक ने कहा - हाँ, मेरे लिए यही मक्का सबसे अच्छा है, क्युकि मुझे संतोष है शायद आगे मुझे इससे अच्छा मक्का मिले, यही सोचकर मैंने इसे चुना है
दार्शनिक ने कहा - यही शादी है, आपको जो मिलता है आप उसे ही अपने लिए सर्वशेष्ठ मानकर उसका स्वीकार करते हैं, और तब आपको कोई शंका नहीं रहेती और आप पूर्ण संतोष से अपनी जींदगी उस साथी के साथ गुजरते हैं :)

Friday, April 30, 2010

ख्वाहिश और हकीकत


क्यों कहेते हो की मेरे साथ कभी बेहतर नहीं होता है
ये
कहो की जैसा चाहो वैसा नहीं होता

कोई
कह देता है, कोई सह लेता है ,
आँखों से बड़ा, आंसुओ का समुन्दर नहीं होता
आज अपनो ही सिखला दिया हमें कि
ठोकरे
देने वाला, हमेशा पत्थर नहीं होता
कट ही जाते हैं मंजिल के लम्बे रास्ते
खुद के साये के सिवा, कोई और हमसफ़र नहीं होता
क्यों जींदगी कि मुश्किलों से हार बैठे हो ? वक़्त से बढ़कर कोई, मरहम नहीं होता

कैसे करोगे !!!??

ये कहे ऐसे करोगे, वो कहे, वैसे करोगे,

ऐसा करोगे, वैसा करोगे, अब हम क्या बताये की, कैसे करोगे


जिसे लाइन में लगो, उसकी बगल की लाइन पहले बढे

जिस मिठाई पे हाँथ रखो, वो ही सबसे महेंगी मिले ।


ऐसा करोगे, वैसा करोगे अब हम क्या बताये की, कैसे करोगे ?


जब पढाई करो तो भुख लगे, जब लड़ाई करो तो प्यास

इस चक्कर में न भुख मिटे और न मिटे प्यास ।


ऐसा करोगे, वैसा करोगे अब हम क्या बताये की, कैसे करोगे ?


अजब दुनिया में हम फंसे अकेले, मिले भी कोई तो बिलकुल थकेले ,

रास्ता है लम्बा, मंजिल बहुत दूर, बिना कोई सहारे कैसे चलोगे ?


ऐसा करोगे, वैसा करोगे अब हम क्या बताये की कैसे करोगे ?


ये परेशान उससे, और वो परेशान इससे

हम परेशान तुमसे, तुम परेशान हमसे

परेशानी ही परेशानी में, समझमे न आए कैसे करोगे ?


ऐसा करोगे, वैसा करोगे अब हम क्या बताये की कैसे करोगे ?


अरे पर कुछ तो करो.......

Tuesday, April 20, 2010

"जीवन और उत्साह"

उत्साह एक बहुत बड़ा वरदान है. ईश्वर ने हमें अलोकिक शक्ति प्रदान की है, अतएव हमें अपना कार्य पूर्ण उत्साह से करना चाहिए. चाहे कार्य किसी भी प्रकार का हो उसे पूर्ण उत्साह के साथ करे, फिर देखिये "चमत्कार"

उमंग और उत्साह एक ऐसी "खुल जा सिम-सिम"है , जो आपके जीवन में बराबर प्रगति और सुख के खजाने पेश करती है. आप अपने आपको अनंत शक्ति और सामर्थ्य का स्वामी माने। प्रत्येक मनुष्य में कार्यक्षमता का अपार सागर लहरा रहा है, वह जो चाहे कर सकता है. हर समय अच्छे विचार अपने मन में लाये. आलस्य, निराशा, आराम या आज का काम कल पर न टाले, ऐसा करने से काम आपके लिए बोझ बन जायेगा. एक बार यदि ट्रेन अपनी पटरी से उतर जाये तो उसे पुनः पटरी पर लाने में बहुत कष्ट उठाना पड़ता है.

उदास और निराश व्यक्ति बिना तेल के दीपक जैसा होता है। मनुष्य उत्साह और सहस के बल पर जीवित रहता है, और विजयी बनता है. जिसके अंतर में उमंगें नहीं उठती, जो नीरस और निस्तब्ध रहता है, वह जींदगी को भार बनाये पशु की तरह जीता है ।

संसार विजयी व्यक्ति का स्वागत करता है । सब उसी मनुष्य को पसंद करते हैं जिसके चहरे से उत्साह और विक्रम झलक रहा हो । जिसके आने पर उत्साह और उल्लास की लहर दौड़ जाये, उसे लोग सर आँखों पर बिठालते हैं, सभी विजयी व्यक्ति पहले मन पर विजय प्राप्त करते हैं । उत्साह-हीनता एक घातक रोग है , जो हमारी योग्यता को नष्ट कर देता है. अदम्य इच्छा-शक्ति और कठिन परिश्रम से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है ।

पारस्परिक सहयोग को मानव जीवन का अत्यधिक महत्वपूर्ण अंग माना गया है, हमें दूसरो के सहयोग से लाभ उठाना चाहिए तथा उन्हें लाभ पहुचने में सहयोग करना चाहिए। एकाकीपन एवं स्वार्थ-परता तुच्छ्ता की पहचान है । जब तक अंतीम सफलता प्राप्त न हो, आराम से न बैठे । अपनी एक विलक्षण पहचान बनाने के लिए कठोर परिश्रम करने पड़ते हैं।

साहसी व्यक्तियों को साहस उधार नहीं मागना पड़ता, किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं पड़ती, उनकी अंतर-आत्मा ही उन्हें बल प्रदान करती है । मुलायम मिटटी के बिछोने में पड़ा बीज यदि ऊपर ढके ढेलो को धकेलने की हिम्मत नहीं दिखलाता तो बीज से वृक्ष बनने का गौरव उसे कैसे प्राप्त होता?

निति के पथ पर बढ़ने वाले को ईश्वर का विश्वास और उनका अनुग्रह काफी है, फिर संसार की कोई भी शक्ति उसे पराजीत नहीं कर सकती । उत्साही बनकर अपने लक्ष्य की ओर बढिये सफलता आपके कदम चूमेगी ।

"होके मायूस न यो शाम से ढलते रहिये, जींदगी भोर है सूरज से निकलते रहिये

एक ही पाव पे ठहरोगे तो थक जाओगे, धीरे धीरे ही सही रह पे चलते रहिये।"

Friday, March 19, 2010


मंजीले बहुत हैं , अफ़साने बहुत हैं,
राहे जींदगी में इम्तेहान आने बहुत हैं .....
मत करो गिला उसका जो मिला,
इस दुनियां में जीने के बहाने बहुत हैं.......

Monday, March 15, 2010

जरुरी तो नहीं....

जो हो जैसा, दिखे वैसा, जरुरी तो नहीं
सारी दुनिया करे ऐतबार, हरबार, जरुरी तो नहीं,

दिल के बदले दिल मीले, प्यार के बदले प्यार, जरुरी तो नहीं
दिल
के टूटे तार, जुड़े हर बार, जरुरी तो नहीं,

भोली सूरत की नीयत हो पाक, जरुरी तो नहीं
दोस्त करे वफ़ा और दुश्मन दगा हर बार, जरुरी तो नहीं,

काले आसमान से हो बारिश, जरुरी तो नहीं
हर
कश्ती डूबे तूफान में हर बार, जरुरी तो नहीं,

हर आंसू कहे दर्द और हंसी बयां करे ख़ुशी, जरुरी तो नहीं
दिल के जख्मो को मीले मरहम हर बार, जरुरी तो नहीं,

मीले
दर्द तो खो जाये मुस्कान, जरुरी तो नहीं
बेवफाई पर किसी की, उठ जाये खुदा से यकीं हर बार, जरुरी तो नहीं





Friday, February 19, 2010


हो के मायूस न यो शाम से ढलते रहिये, जिंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिये,
एक ही पांव पे ठहरोगे तो थक जाओगे, धीरे धीरे ही सही, राह पे चलते रहिये ।

Monday, February 8, 2010

Mere Vichar

विचारों के इस मंच पर अपने विचार रखने से पहेले मैंने सोचा की क्या ये जरुरी है ? पहेला विकल्प मन में आया की नहीं, बिलकुल नहीं, समय व्यतीत करने के आलावा कुछ नहीं पर फिर दुसरे विकल्प पर ध्यान गया की इस दौड़ती भागती दुनिया में जब हमारे पास इतना भी समय नहीं की हम अपने आस-पास के लोगों की बात सुन सके या अपनी बात कह सके तो क्यों न अपने विचार लिख लिए जाए, इसका एक उपयोग यह होगा की मेरे उपलब्ध न रहेने पर भी मेरी बात लोगों तक पहुचेगी, और दूसरा की अपने विचारों पर दूसरों की प्रतिक्रिया (उनकी भी जिन्हें मैं नहीं जानती, पर फिर भी वो मेरे विचार जानना चाह रहे हैं) भी जान सकुंगी। कभी कभी किसी घटना पर जब हम प्रतिक्रिया देते हैं तो वो न सिर्फ हमारा अपना तर्क होता है परन्तु कही न कही हम उस घटना को स्वयं से जोड़ कर देखने लगते हैं की हम क्या कर सकते थे। इस ब्लॉग की शुरुआत मैं इसी अपेक्षा से कर रही हु की मेरे विचार ही मेरी भावना को सही अभिव्यक्ति दे सकते हैं